उत्तराखंड की लोकसंस्कृति में पर्व केवल तिथि नहीं होते, बल्कि वे पीढ़ियों से चली आ रही लोक कथाओं, विश्वासों और प्रकृति से जुड़ाव के प्रतीक भी होते हैं। ऐसा ही एक विशिष्ट लोकपर्व है-घुघुतिया त्यौहार, जिसे मकर संक्रांति यानी माघ महीने के पहले दिन पूरे उत्साह और उमंग के साथ मनाया जाता है। इस दिन यहाँ कौओं को न्योतने (आमंत्रित करने) की विशेष परम्परा है। इस पोस्ट में हम उत्तराखण्ड के काले कौआ काले वाले त्यौहार के बारे में विस्तृत में जानेंगे।
घुघुतिया त्यार के अनेक नाम
उत्तराखंड में मकर संक्रांति को अलग-अलग क्षेत्रों में विभिन्न नामों से पहचाना जाता है। कुमाऊँ अंचल में इसे घुघुतिया त्यार या पुस्योड़िया संक्रांति कहा जाता है, वहीं उत्तरैण, उत्तरायणी के नाम से यहाँ विभिन्न स्थानों में मेले लगते हैं। गढ़वाल अंचल में इसे मकरैण, घोल्डा, घ्वौला, चुन्या त्यार, खिचड़ी संक्रांति और खिचड़ी संक्रांद के नाम से मनाते हैं। ये सभी नाम स्थानीय परंपराओं और व्यंजनों से जुड़े हुए हैं।
उत्तरायणी: लोकपर्व और प्रकृति से जुड़ाव
मकर संक्रांति के दिन सूर्य उत्तरायण होता है, यानी सूर्य उत्तर दिशा की ओर जाना प्रारम्भ करते हैं। जिसे उत्तराखंड में शुभ परिवर्तन का संकेत माना जाता है। इस दिन गंगा स्नान का विशेष महत्व है। वहीं इस दिन कौवों को विशेष पकवान खिलाने की परंपरा है। माना जाता है कि कौवे पितरों के प्रतीक होते हैं, इसलिए उन्हें भोजन कराना पुण्यकारी माना जाता है। हिन्दू धर्म में माघ माह को पवित्र माह मानते हैं। इस दिन से पूरे माह तक लोग खिचड़ी का दान करते हैं।
घुघुत: एक पकवान, एक प्रतीक
घुघुतिया पर्व का सबसे प्रमुख पकवान है घुघुत या घुघुते। आटे को गुड़ के शरबत से गूंथकर बनाए जाने वाले ये पकवान हिंदी के अंक ‘४’ के आकार के बनाये जाते हैं। रोचक तथ्य यह है कि पहाड़ों में घुघुत एक पक्षी का नाम भी है। हालांकि इस बात का कोई प्रामाणिक ऐतिहासिक उल्लेख नहीं है कि इस पकवान का नाम घुघुत क्यों पड़ा या यह परंपरा कब शुरू हुई। लेकिन इस सम्बन्ध में पहाड़ों अलग-अलग लोक कथाएं प्रचलित हैं। लेकिन सभी में एक बात समान है- वह है कौए को खिलाना। आईये पढ़ते हैं -घुघुतिया के अवसर पर कौवे क्यों बुलाये जाते हैं।
घुघुतिया से जुड़ी लोककथाएँ
पहली कथा: राजा घुघुत और कौवों पर भविष्यवाणी
एक लोककथा के अनुसार, प्राचीन काल में घुघुत नाम का एक राजा हुआ करता था। एक ज्योतिषी ने भविष्यवाणी की कि मकर संक्रांति की सुबह कौवों द्वारा उसकी हत्या कर दी जाएगी। राजा ने इस संकट से उबरने के लिए एक उपाय सोचा। जिसमें उसने पूरे राज्य में घोषणा करवाई कि गुड़ और आटे से बने एक ख़ास प्रकार के पकवान को बनाकर अपने बच्चों के हाथों कौवों को खिलाये जाएँ।
राजा का अनुमान था कि पकवानों में उलझे कौवे आक्रमण करना भूल जाएंगे। इसी राजा के नाम पर इन पकवानों को घुघुत कहा जाने लगा और यह परंपरा चल पड़ी। आज भी इस परम्परा का निर्वहन करते हुए कौवे न्यौते जाते हैं।
मारक ग्रहयोग टालने की जनश्रुति
एक अन्य कहावत के अनुसार, पहाड़ों के किसी राजा पर मारक ग्रहदशा चल रही थी। राज्य के ज्योतिषी ने सलाह दी कि यदि वह कौवों को घुघुत (फाख्ता) खिलाए तो संकट टल सकता है। लेकिन राजा अहिंसक था, वह अपने संकट से बचने के लिए निर्दोष पक्षियों को नहीं मारना चाहता था। उसने इस उपाय सोचा और प्रतीकात्मक रूप से गुड़-आटे के घुघुत बनवाकर बच्चों से कौवों को खिलवाया। तभी से यह परंपरा लोकपर्व का रूप ले गई और आज के समय में भी इन दिन कौओं को हर परिवार खाने को आमंत्रित करता है।
क्या घुघुतिया त्यौहार मनाने के पीछे असल कारण यह है ?
कुमाऊँ में घुघुतिया त्यार क्यों मनाया जाता है. इसके पीछे यह कहानी भी जोड़ी जाती है। कुमाऊं में चंद वंश का राज था। तत्कालीन राजा कल्यानचंद थे, जिसकी कोई संतान नहीं थी। भगवान बागनाथ की कृपा से बुढ़ापे में उनका एक बेटा हुआ। जिसका नाम निर्भय चंद रखा गया। इस कहानी को विस्तृत में पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें – पूरी कहानी।
कौवे और पहाड़ों का रिश्ता
कौवे और पहाड़ों का रिश्ता बहुत पुराना है। एक व्यवहारिक मान्यता यह भी है कि कठोर सर्दी और हिमपात के कारण अधिकांश पक्षी मैदानों की ओर चले जाते हैं, लेकिन कौवा पहाड़ नहीं छोड़ता। इसी कारण स्थानीय लोग उसके प्रति सम्मान प्रकट करते हुए मकर संक्रांति पर उसे विशेष भोजन कराते हैं।
गढ़वाल और कुमाऊँ की अलग-अलग परंपराएँ
गढ़वाल क्षेत्र में इस पर्व को ‘चुन्या त्यार’ कहा जाता है। इस दिन दाल, चावल, झंगोरा सहित सात अनाजों को पीसकर चुन्या नामक व्यंजन बनाया जाता है। वहीं मीठे आटे से बने घोल्डा या घ्वौलो के कारण इसे घोल्डा या घ्वौल भी कहा जाता है।
निष्कर्ष
घुघुतिया त्यौहार केवल एक पर्व नहीं, बल्कि प्रकृति, लोककथा, विश्वास और मानवीय संवेदनाओं का त्यौहार भी है। पहाड़ों में कौवों के प्रति कृतज्ञता, बच्चों की मासूम खुशी और लोककथाओं की गहराई, यही इस पर्व को उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान बनाती है।









