उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में पर्वतीय समाज की सांस्कृतिक पहचान और ऐतिहासिक चेतना का प्रतीक उत्तरायणी मेला यानी कौथिग 2026 का आगाज भव्य शोभायात्रा के साथ हो गया है। पर्वतीय महापरिषद, उत्तर प्रदेश द्वारा आयोजित इस मेले का उद्घाटन उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी द्वारा दीप प्रज्ज्वलित कर किया गया। यह 15 दिवसीय पौराणिक, सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक मेला 28 जनवरी 2026 तक गोमती तट स्थित भारत रत्न पं. गोविन्द बल्लभ पंत पर्वतीय सांस्कृतिक उपवन में संपन्न होगा।
25 वर्षों की समाज व संस्कृति सेवा
उत्तराखण्ड राज्य गठन के बाद लखनऊ की 32 सामाजिक एवं सांस्कृतिक संस्थाओं की शीर्ष संस्था के रूप में गठित पर्वतीय महापरिषद इस वर्ष 25 पूर्ण कर रही है। “समाज एवं संस्कृति सेवा के 25 शानदार वर्ष” थीम पर इस बार उत्तरायणी कौथिग को दिव्य, भव्य, नव्य और वृहद स्वरूप प्रदान किया जा रहा है।
लोक कला, संस्कृति और उत्पादों का संगम
मेले में उत्तराखण्ड की लोक कला, लोक संस्कृति और पारंपरिक विरासत से जुड़े विविध सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित जा रहे हैं। इसके साथ ही पर्वतीय जैविक खाद्य सामग्री, हस्तशिल्प और स्थानीय उत्पादों से सजे 150 से अधिक स्टॉल दर्शकों को आकर्षित कर रहे हैं। जिमें पहाड़ी जैविक खाद्य सामग्री, दालें, मसाले, सब्जियाँ, फल, अल्मोड़ा की प्रसिद्ध बाल मिठाई, शाल, ऊनी वस्त्र, बर्तन एवं कृषि उत्पाद उपलब्ध हैं।
मेले के प्रमुख आकर्षण-
- पारंपरिक लोक नृत्य छपेली नृत्य प्रतियोगिता ‘झूमेगा–2026’, जिसमें विजयी टीम को एक लाख का पुरस्कार दिया जायेगा।
- उत्तराखंड की लोकगाथाओं पर आधारित नृत्य-नाटिका प्रतियोगिता
- “पहाड़ी धुनों पर देसी ठुमका” प्रतियोगिता
- झोड़ा-थड़िया की 40 टीमों के माध्यम से 2000 से अधिक महिलाओं की सहभागिता
- अपनी बोली-भाषा पर विशेष वक्तृत्व प्रतियोगिता
- उत्तराखंड राज्य आंदोलन के आंदोलनकारियों का सम्मान
- विद्यार्थियों के उज्ज्वल भविष्य हेतु करियर काउंसलिंग सत्र एवं व्यक्तिगत काउंसलिंग सुविधा
उत्तरायणी पर्व का ऐतिहासिक महत्व
भगवान सूर्य के धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश को मकर संक्रांति कहा जाता है, जिसे देशभर में खिचड़ी, पोंगल, बिहू और लोहड़ी जैसे विभिन्न नामों से मनाया जाता है। उत्तराखण्ड में यह पर्व “उत्तरायणी” के नाम से प्रसिद्ध है। यहाँ उल्लेखनीय है उत्तराखण्ड में मेले को कौथिग या कौतिक कहा जाता है।
आंदोलन और जनचेतना से जुड़ा इतिहास
उत्तराखंड में उत्तरायणी केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना का भी प्रतीक रहा है। इतिहास गवाह है कि आज ही के दिन यानी उत्तरायणी के अवसर पर जनपद बागेश्वर में अंग्रेजी हुकूमत की कुप्रथा कुली बेगार प्रथा के विरोध में हजारों लोगों ने सरयू-गोमती और अदृश्य सरस्वती के त्रिवेणी संगम पर कुली रजिस्टर फाड़कर बहा दिए थे। यही कारण है कि उत्तरायणी को उत्तराखण्ड के स्वाधीनता आंदोलन की शुरुआत से भी जोड़ा जाता है।
नई पीढ़ी को जोड़ने का प्रयास
लखनऊ में आयोजित उत्तरायणी मेला (कौथिग) पर्वतीय समाज की नई पीढ़ी को अपनी लोक कला और संस्कृति से जोड़ने के साथ-साथ समाज में प्रेम, सद्भाव और एकता का संदेश देता है। गोमती तट पर इस आयोजन में लखनऊवासियों की व्यापक भागीदारी इसकी लोकप्रियता का प्रमाण है।
उत्तराखंड प्रवासियों को अपनी जड़ों से जोड़ता लखनऊ के इस उत्तरायणी मेला को देखना है तो चले आएं गोमती तट स्थित भारत रत्न पं. गोविन्द बल्लभ पंत पर्वतीय सांस्कृतिक उपवन में जहाँ एक मिनी उत्तराखण्ड आप सभी का स्वागत करने को तैयार होगा।










