हर वर्ष कुमाऊं मंडल के बागेश्वर में आयोजित होने वाला ऐतिहासिक उत्तरायणी मेला केवल एक परंपरागत आयोजन नहीं, बल्कि लोकसंस्कृति, आस्था और सामाजिक एकता का जीवंत उत्सव है। मकर संक्रांति के पावन अवसर पर लगने वाला यह मेला बागनाथ मंदिर और सरयू–गोमती संगम के तट पर श्रद्धा, लोकगीतों, पारंपरिक व्यंजनों और मेल-मिलाप की अनूठी छटा बिखेर देता है। दूर-दराज़ के गांवों से लेकर शहरों तक के लोग इस मेले में शामिल होकर अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ने का अवसर पाते हैं, जिससे उत्तरायणी मेला कुमाऊं की पहचान और गौरव का प्रतीक है।
कुली बेगार आंदोलन ने उत्तरायणी मेले में दिया था मंच –
वर्ष 1921 के ऐतिहासिक कुली बेगार आंदोलन ने उत्तरायणी के मेले में राजनीतिक दलों को भी अपने विचार रखने का मंच प्रदान कर दिया था। तब से लेकर उत्तरायणी के मेले में प्रमुख राजनीतिक दल सरयू बगड़ में अपने अपने पंडाल सजाते आए हैं और जनता से संवाद करते आए हैं।
शायद आज की नई पीढ़ी को बहुत कम मालूम होगा कि 14,जनवरी,1921 को बागेश्वर के उत्तरायणी मेले से ही उत्तराखंड के दोनों प्रान्तों कुमाऊं और गढ़वाल में कुली-बेगार कुप्रथा को समाप्त करने के लिए बद्री दत्त पाण्डे और अनुसूया प्रसाद बहुगुणा के नेतृत्व में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ जो जनआंदोलन चला, वह समूचे भारत में अपनी तरह का पहला और अभूतपूर्व राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन का शुभारंभ भी था।
देश में आजकल किस प्रकार की सत्ता लोलुप देश भक्तों की राजनीति हावी है, उसका एक उदाहरण बागेश्वर के कुली बेगार जन आंदोलन के प्रति अवसरवादी राजनेताओं का यह उदासीन रवैया भी है। अपने स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास को भुला देना और अपने राजनैतिक हितों को ही महत्व देना आज की क्षुद्र राजनीति का मानो स्वभाव सा बन गया है। इस सम्बन्ध में एक इतिहासकार का यह कथन सही है कि यदि आपको अपनी आजादी की रक्षा करनी है तो अपने स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास को भी सदा याद रखना चाहिए और उन स्वतंत्रता सेनानियों को सम्मानित भी करना चाहिए, जिन्होंने हमारी आजादी के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया, यहां तक कि अपने प्राण भी न्योछावर कर दिए।
बागेश्वर सदियों से सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक और राजनैतिक घटनाक्रमों का भी मुख्य केंद्र रहा है तथा उसके साथ स्वतंत्रता आंदोलन की कई ऐतिहासिक कड़ियां जुड़ी हुई हैं। किन्तु हमारी उत्तराखंड की सांस्कृतिक संस्थाओं के लिए आज उत्तरायणी पर्व महज एक त्योहार, लोक गीत संगीत और सांस्कृतिक मेले तक सीमित रह गया है, इसके ऐतिहासिक और राष्ट्रीय महत्व के प्रति जन सामान्य का उदासीन रवैया भी चिंताजनक है।
उत्तराखंड के नेताओं ने गुलामी के काले कलंक को सरयू के जल से धोया था –
आज से 106 साल पहले हमारे उत्तराखंड के नेताओं ने गुलामी के एक काले कलंक-कुली बेगार कुप्रथा को इसी बागेश्वर में बहने वाली पुण्य सलिला सरयू के जल से धोया था और यहां सरजू बगड़ में भारी मात्रा में इकट्ठा होकर अंग्रेजों के विरुद्ध आजादी की लड़ाई का बिगुल बजा दिया था। कुमाऊँ और गढ़वाल की जनता द्वारा पहली बार मिलकर लड़े गए उत्तराखंड के इस स्वतंत्रता आंदोलन ने समूचे पहाड़ में जहां एक ओर अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ सल्टक्रांति, सालम क्रांति जैसे आंदोलनों को जन्म दिया, वहां दूसरी ओर ‘कुमाऊं केसरी’ बद्रीदत्त पांडे और ‘गढ़केसरी’ अनुसूया प्रसाद बहुगुणा जैसे स्वतंत्रता सेनानी भी पैदा किए, जिन्होंने आजादी की इस लड़ाई को देशव्यापी राष्ट्रीय आंदोलन का रूप देने में सफलता पाई। पर विडम्बना यह है कि उपनिवेशवादी इतिहास लेखकों ने राष्ट्रीय इतिहास लेखन के धरातल पर सदैव उपेक्षा की और वर्तमान नेता भी इसके औचित्य को नजर अंदाज कर देते हैं। यही कारण है कि बागेश्वर के कुली बेगार आंदोलन की सौवीं जयंती का आयोजन करना तो दूर रहा, हमारी उत्तराखंड सरकार और केंद्र सरकार ने उस राष्ट्रीय आंदोलन का नाम लेना तक उचित नहीं समझा।
अंग्रेजों के सारे कुली रजिस्टर फाड़कर सरयू में प्रवाहित कर दिए थे –
गौरतलब है कि भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास की दृष्टि से ‘उत्तरायणी’ के दिन ही बागेश्वर में सन 1921 में एक महत्वपूर्ण राजनैतिक घटना हुई थी जब कुमाऊं केसरी बद्रीदत पांडे के नेतृत्व में अंग्रेजी हुकूमत द्वारा पोषित कुली बेगार कुप्रथा के प्रतीक स्वरूप एक पोटली व रजिस्टर को सरयू और गोमती के पावन संगम में बहाकर अंग्रेज शासकों के विरुद्ध संघर्ष का बिगुल बजाया गया था। तभी से उत्तराखण्ड में और समूचे देश में राष्ट्रीय स्तर पर स्वतंत्रता संग्राम की भी शुरुआत हो गई थी। गांधी जी को बागेश्वर के इसी अहिंसक जन आंदोलन से आजादी की लड़ाई के लिए ‘सत्याग्रह’ की प्रेरणा मिली थी। आंदोलन से प्रभावित होकर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने इस अहिंसक आंदोलन को ‘रक्तहीन क्रांति’ का नाम दिया था।
उत्तरायणी मेले का राजनैतिक पृष्ठभूमि का आंकलन-
इस मेले की राजनैतिक पृष्ठभूमि का यदि आंकलन किया जाए तो सन् 1920 में देश की आजादी के लिए संघर्षशील नेताओं के नेतृत्व में नागपुर में कांग्रेस का एक वार्षिक अधिवेशन हुआ था, जिसमें पं० गोविन्द बल्लभ पंत, बद्रीदत्त पाण्डे, हर गोबिन्द पन्त, विक्टर मोहन जोशी, श्याम लाल शाह आदि लोग सम्मिलित हुए थे और इसी अधिवेशन में बद्रीदत्त पाण्डे जी ने कुली बेगार आन्दोलन को जन-आंदोलन का स्वरूप देने के लिये महात्मा गांधी जी से आशीर्वाद मांगा। गांधी जी से आशीर्वाद लेकर उत्तराखंड के इन सभी नेताओं ने कुमाऊं और गढ़वाल में कुली-बेगार प्रथा कुरीति के खिलाफ जन जागरण के कार्यक्रम चलाने शुरु कर दिए थे।आजादी के लिए संघर्ष हेतु इसी राजनैतिक अभियान के तहत कुली बेगार आन्दोलन 14 जनवरी,1921 में बागेश्वर स्थित उत्तरायणी के अवसर पर कुमाऊं केसरी बद्री दत्त पाण्डे की अगुवाई में ब्रिटिश हुकुमत के विरुद्ध हुआ था। क्योंकि इस मेले में कुमाऊं गढ़वाल,नेपाल आदि दूर दराज के इलाकों से भी लोग शरीक होने के लिए आते थे। इस वजह से इस कुली बेगार समाप्ति की मुहिम का प्रभाव सम्पूर्ण उत्तराखण्ड में ही नहीं बल्कि समूचे देश के स्वतंत्रता आंदोलन पर भी पड़ा। देखते ही देखते इस आंदोलन ने जन आंदोलन का रूप धारण कर लिया।
कुमाऊं मण्डल में इस कुप्रथा की कमान बद्रीदत्त पाण्डे जी के हाथ में थी तो वहीं गढ़वाल मण्डल में इसकी कमान अनुसूया प्रसाद बहुगुणा ने संभाल रखी थी। इस आन्दोलन की सफलता के कारण अंग्रेज हुक्मरानों को कुली बेगार जैसे काले कानून को वापस लेना पड़ा। इस जन आंदोलन के सफल होने के बाद बद्रीदत्त पाण्डे जी को ‘कुमाऊं केसरी’ और अनुसूया प्रसाद बहुगुणा जी को ‘गढ़ केसरी’ का खिताब जनता द्वारा दिया गया था। उत्तराखंड के जन आंदोलन का यह इतना सशक्त आंदोलन था जिसकी परिणति बाद में सन 1942 में अगस्त की सल्ट क्रांति के रूप में हुई। उत्तराखंड वासियों के लिए जरूरी है कि वे 14 जनवरी,1921 की कुली बेगार मुक्ति आंदोलन जैसी गौरवशाली इतिहास की घटना को सदैव याद रखें। ऐसी घटनाओं को इसलिए भी याद रखना जरूरी है ताकि हमारे भविष्य की आजादी की रक्षा हो सके। मकर संक्रान्ति और ‘उत्तरायणी’ पर्व की सभी देशवासियों को हार्दिक शुभकामनाएं।
आलेख- स्वर्गीय डा.मोहन चंद तिवारी










