चिंताजनक- इधर बसंत की दस्तक, उधर हिमालय को बर्फवारी का इंतजार..

On: January 21, 2026 9:51 PM
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ग्राउंड जीरो से संजय चौहान।
इधर बसंत दस्तक देने लगा है, पहाड़ों के गांवों में बुरांस, पीले फ्यूंली के फूल, पेड़ों में रंग बिरंगे फूल खिलने लगे है जो बसंत आगमन का सूचक है। बसंत का आगमन पहाड़ों में खुशियों की सौगात लेकर आता है। सर्दियों के मौसम की विदाई के उपरांत पहाड़ की ऊंची ऊंची चोटियों पर पड़ी बर्फ धीरे धीरे पिघलने लग जाती है। लेकिन इस बार अभी तक हिमालय की पहाड़ बिना बर्फ के नजर आ रही है जो की शुभ संकेत नहीं है। हिमालय में हिम अकाल जैसी स्थिति आ गई है जो पारिस्थितिक तंत्र के लिए भी कोई सुखद संकेत नहीं है।

बारिश के मौसम में हुई रिकॉर्ड बारिश और बरसात सीज़न के लम्बे पीरियड तक खींचने के बाद अनुमान लगाया जा रहा था कि इस बार सर्दियों में बर्फवारी के सारे रिकॉर्ड टूट जाएंगे और कड़ाके की सर्दी पड़ेगी। पर, हुआ एकदम उल्ट बरसात सीज़न के 4 महीने बीत जाने के बाद अभी तक न सर्दियों की बारिश हुई और न बर्फ़वारी। जिससे खेती, बागवानी पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। यही नहीं आने वाले गर्मियों में पानी का संकट गहराएगा और तापमान में बेतहाशा बढ़ोत्तरी के लिए भी तैयार रहना होगा।

मौसम चक्र में भारी बदलाव है प्रमुख कारण

पर्यावरणविद चंदन नयाल इस साल बर्फवारी न होने से बेहद चिंतित दिखाई दे रहे हैं, वे कहते हैं कि विगत कुछ सालों से मौसम चक्र में हुये भारी परिवर्तन से सर्दियों में बारिश कम हो रही है। इस साल सर्दियों में बहुत ही कम बारिश और न्यून बर्फवारी हुई जिस कारण हिमालय में मौजूद छोटे बड़े ताल, झील और कुंड में पानी की कमी पायी गई है। ये सब शुभ संकेत नहीं है।

पानी के बहुत बड़े रिचार्ज टैंक

हिमालय में मौजूद हजारों ताल, झील और कुंड पानी के बहुत बड़े रिचार्ज टैंक हैं। इनके कारण ही हिमालय से निकलने वाली नदियाँ वर्षभर सदानीर रहती है। साथ ही हिमालय में विचरण करने वाले जानवरों, पशु – पक्षियों से लेकर सैलानियों के लिए प्यास बुझाने के स्रोत होते हैं। ऐसे में इन रिचार्ज टैंको का सूखना भविष्य के लिए खतरे की घंटी है।

अब समय आ गया है कि हमें पर्यावरण को लेकर कुछ कठोर कदम उठाने पड़ेंगे साथ ही लोगों को जागरूक करना होगा। जल, जंगल को लेकर दीर्घकालिक योजनाओं को धरातल पर उतारना होगा। पहाड़ों को भीड़ तंत्र से बचाना होग और मानवीय हस्तक्षेप को कम करना होगा। घटते जंगलों, आग लगने की घटनाओं और सीमेंट के जंगलों में कमी लानी होगी। यदि हम अभी नहीं चेते तो बहुत देर हो जाएगी।

विनोद सिंह गढ़िया

विनोद सिंह गढ़िया इस पोर्टल के फाउंडर और कंटेंट क्रिएटर है। करीब 15 वर्षों से वे विभिन्न डिजिटल मंचों के माध्यम से उत्तराखण्ड की संस्कृति, परंपरा, पर्यटन आदि से जुड़े लेख और सम-सामयिक घटनाओं पर आधारित समाचार आप सभी तक पहुंचाते हैं।

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