कपकोट का काशिल देव मंदिर: इतिहास, मान्यता और पर्यटन महत्व

On: April 5, 2026 6:56 PM
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Kashil Dev Mandir Kapkot

Kashil Dev Mandir Kapkot: उत्तराखंड के कपकोट तहसील मुख्यालय से करीब दो किलोमीटर की दूरी पर स्थित श्री 1008 काशिल देव जी का मंदिर क्षेत्रवासियों की गहरी आस्था और विश्वास का केंद्र है। लोगों का मानना है कि जो भी इन्हें सच्चे मन से याद करते हैं वे उन्हें मन वांछित फल प्रदान करते हैं। स्थानीय लोग उन्हें बूबू और बहुएं ससुर देव के नाम से पुकारती हैं। कपकोट गांव की सुरम्य पहाड़ी पर स्थित उनके प्राचीन मंदिर का परिवेश न केवल आध्यात्मिक शांति प्रदान करता है, बल्कि प्राकृतिक सौंदर्य से भी भरपूर है।

स्याल्दे बिखौती पर होती है पूजा

वैसे तो यहाँ वर्षभर श्रद्धालुओं का आवागमन रहता है लेकिन प्रत्येक वर्ष बैसाख महीने के 3 पैट (15-16 अप्रैल) को मंदिर में विशेष पूजा अनुष्ठान होते हैं और क्षेत्र का प्रसिद्ध स्याल्दे बिखौती मेला लगता है। इस अवसर पर दूर-दूर से श्रद्धालु मंदिर में पहुंचते हैं और मन्नत माँगते हैं। अपनी मनोकामना पूर्ण होने पर वे मंदिर में घंटियां, शंख एवं अन्य पूजन सामग्री चढ़ाते हैं। पूजा के दौरान मंदिर में गौदान पाठ कर काशिल बुबू को नए अन्न का भोग लगाया जाता है। वहीं श्रद्धालु वर्षभर मंदिर में कथा, हवन आदि का आयोजन करते हैं।

ऐतिहासिक मान्यता और महत्व

पिंडारी ग्लेशियर मार्ग से लगभग दो किलोमीटर की दूरी पर स्थित इस मंदिर के बारे में मान्यता है कि काशिल देव को लगभग 500 वर्ष पूर्व राजा रत कपकोटी नेपाल से अपने साथ यहां लाए थे। काशिल देव उनके आराध्य देवता थे और राजा कोई भी महत्वपूर्ण निर्णय उनकी अनुमति के बगैर नहीं लेते थे।

स्थानीय लोगों का विश्वास है कि काशिल देव उनकी खेती और बागवानी को ओलावृष्टि से बचाते हैं और गांव की अनिष्ट से रक्षा करते हैं। यहाँ मंदिर परिसर में भगवती माता, बाण देवता और राजा रत कपकोटी की सती पुत्री बाली कुसुम का भी मंदिर है, जहाँ काशिल देव जी की पूजा के दौरान इन मंदिरों के कपाट भी खोले जाते हैं और पूजा अर्चना की जाती है।

परंपराएं और आस्था

स्याल्दे बिखौती के अवसर पर कपकोट, गैनाड़, भंडारीगांव, गैरखेत, उत्तरौड़ा और फुलवारी गॉंवों के लोग मंदिर में नए अनाज का भोग चढ़ाते हैं। यह परंपरा क्षेत्र की कृषि संस्कृति और देव आस्था का सुंदर उदाहरण है।

स्थानीय बुजुर्गों के अनुसार, आज की भांति पुराने जमाने में पंचांग नहीं होते थे, तब काशिल देव इसी पहाड़ी से लोगों को धात (आवाज) लगाकर विभिन्न त्योहारों, अमावस्या और पूर्णिमा जैसे पर्वों की जानकारी भी देते थे। वहीं वे क्षेत्र में घटित होने वाली किसी भी अप्रिय घटना की पूर्व जानकारी देते हुए लोगों को सचेत करते थे।

भगवान विष्णु के अवतार के रूप में पूजन

मंदिर के पुजारियों के अनुसार, काशिल देव जी को भगवान विष्णु का अवतार माना जाता है। यही कारण है कि उन्हें लाल रंग का पिठ्या (तिलक) नहीं चढ़ाया जाता, जो इस मंदिर की विशिष्ट परंपरा है।

काशिल बबू की छत्र छाया पर चल रहा विद्यालय

काशिल देव मंदिर के समीप ही ब्रिटिशकालीन राजकीय इंटर कॉलेज कपकोट भी स्थित है। जहाँ हमेशा पठन-पाठन काशील बूबू की छत्रछाया में होता है और विद्यालय के लिए अनुकूल वातावरण बनता है। बोर्ड की परीक्षाओं से पूर्व यहाँ के छात्र-छात्राएं मंदिर में श्री सत्यनारायण की कथा और भंडारे का आयोजन उनसे सफलता की कामना करते हैं।

प्राकृतिक सौंदर्य और पर्यटन की संभावनाएं

मंदिर परिसर से दिखने वाला हिमालय का विहंगम दृश्य हर किसी को आकर्षित करता है। यहां से कपकोट , ऐठाण, भयूं, फरसाली, बमसेरा और चीराबगड़ गांवों के सीढ़ीनुमा हरेभरे खेतों के साथ-साथ शिखर पर्वत और पवित्र सरयू नदी के दर्शन होते हैं।

यदि इस मंदिर का धार्मिक पर्यटन की दृष्टि से समुचित विकास किया जाए, तो यह स्थल न केवल आस्था का प्रमुख केंद्र बनेगा, बल्कि क्षेत्र में पर्यटन की गतिविधियों को भी नई दिशा प्रदान करेगा।

निष्कर्षतः श्री 1008 काशिल देव मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि क्षेत्रवासियों की आस्था, परंपरा और प्राकृतिक सौंदर्य का अद्भुत संगम स्थल भी है। यहां की मान्यताएं, मेले और सांस्कृतिक परंपराएं इसे उत्तराखंड के प्रमुख आस्था के स्थलों में एक विशिष्ट स्थान दिलाती हैं।

कपकोट में काशिल बुबू मंदिर से जुड़ी एक लोककथा प्रचलित है। कहा जाता है कि राजा रत कपकोटी मुगलों के अत्याचार से परेशान होकर नेपाल देश चले गए थे। कुछ समय वहां रहने के बाद वे इस क्षेत्र में आये और साथ में अपने ईष्ट काशील देव को भी लाये। कपकोट आने के बाद नेपाल के लोगों को आभास होने लगा कि काशिल देव के चले जाने से उनके क्षेत्र में अप्रिय घटनाएं होने लगी हैं। वे देवता को लाने के लिए कपकोट पहुंचे। आगे फिर क्या हुआ ? पढ़ने के लिए इस लिंक पर जाएँ – काशिल देव मंदिर और बाली कुसुम की लोककथा

विनोद सिंह गढ़िया

विनोद सिंह गढ़िया इस पोर्टल के फाउंडर और कंटेंट क्रिएटर है। करीब 15 वर्षों से वे विभिन्न डिजिटल मंचों के माध्यम से उत्तराखण्ड की संस्कृति, परंपरा, पर्यटन आदि से जुड़े लेख और सम-सामयिक घटनाओं पर आधारित समाचार आप सभी तक पहुंचाते हैं।

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