उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में एक ऐसा गांव है, जहां विवाह की परंपरा पूरे देश से बिल्कुल अलग है। हिंदू विवाह संस्कार में आमतौर पर वर–वधु अग्निवेदी के सात फेरे लेकर विवाह बंधन में बंधते हैं, लेकिन रुद्रप्रयाग जनपद के अगस्त्यमुनि ब्लॉक की ग्रामसभा धारकोट का निरवाली गांव इस परंपरा से अलग अपनी सदियों पुरानी संस्कृति को निभाता आ रहा है। यहां विवाह की वेदी नहीं होती, बल्कि उसकी जगह भगवान बदरीनाथ की मूर्ति को रखा जाता है, जिसे साक्षी मानकर फेरे लिए जाते हैं।
भगवान बदरीनाथ को माना जाता है आदिदेव
निरवाली गांव के सती ब्राह्मणों की मान्यता है कि भगवान बदरीनाथ उनके आदिदेव हैं। विवाह ही नहीं, बल्कि गांव के अन्य धार्मिक कार्यों में भी भगवान बदरीनाथ की प्रतीक स्वरूप मूर्ति और पौराणिक निशान शामिल किए जाते हैं। ग्रामीणों के अनुसार, यह परंपरा आदिगुरु शंकराचार्य के आगमन से जुड़ी है। माना जाता है कि बदरीनाथ की यात्रा के दौरान आदिगुरु शंकराचार्य निरवाली गांव में विश्राम के लिए रुके थे, और तभी से यह गांव बदरीनाथ से विशेष रूप से जुड़ा हुआ है।
वेदी की जगह बदरीनाथ की मूर्ति
जहां पूरे देश में अग्निवेदी को विवाह का आधार माना जाता है, वहीं निरवाली गांव में अग्नि की वेदी नहीं बनाई जाती। यहां –
- विवाह के समय भगवान बदरीनाथ की मूर्ति को वेदी के स्थान पर स्थापित किया जाता है।
- वर–वधु उसी मूर्ति के चारों ओर फेरे लेते हैं।
- इसे पूर्ण विवाह माना जाता है।
यह परंपरा आज तक बिना किसी परिवर्तन के चली आ रही है, जो गांव की धार्मिक प्रतिबद्धता और सांस्कृतिक विशिष्टता को दर्शाती है।
सदियों पुरानी परंपरा और पौराणिक निशान
गांव के वृद्धजन बताते हैं कि गांव में आज भी भगवान बदरीनाथ का पौराणिक निशान मौजूद है, जिसे हर बड़े समारोह में शामिल किया जाता है। ग्रामीण बताते हैं –
- निशान की विधिवत यात्रा भी आयोजित होती है।
- निशान ले जाने वाले व्यक्ति को उस अवधि में ब्रह्मचर्य का पालन करना होता है।
- पूजा संपन्न होने तक वह अन्न ग्रहण भी नहीं करता।
- भगवान बदरीनाथ की मूर्ति को कोई सामान्य व्यक्ति छू नहीं सकता।
- मूर्ति ले जाने वाले व्यक्ति को भी गांववासी आदरवश नहीं छूते।
इन परंपराओं से गांव में भगवान बदरीनाथ के प्रति गहरी श्रद्धा और आस्था का पता चलता है।
शंकराचार्य के आगमन के प्रमाण आज भी मौजूद
यहाँ के ग्रामीण बताते हैं कि ऋषिकेश से बदरीनाथ जाते समय आदि गुरु शंकराचार्य ने केवल एक ही स्थान पर विश्राम किया था, वह था निरवाली गांव।
गांव में आज भी:
- शंकराचार्य के आगमन के चिह्न मौजूद हैं।
- उनके द्वारा स्थापित सूरजकुंड मंदिर भी आस्था का केंद्र है।
इन ऐतिहासिक और पौराणिक तथ्यों के कारण गांव में बदरीनाथ मंदिर से जुड़ी मान्यताएं और प्रथाएं पीढ़ियों से संरक्षित हैं।
निरवाली गांव: आस्था और परंपरा का जीवंत उदाहरण
निरवाली गांव की विवाह परंपरा सिर्फ एक अनूठी रस्म नहीं, बल्कि उस सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है जो सदियों से यहां के लोगों के जीवन का आधार रही है। भगवान बदरीनाथ को साक्षी मानकर विवाह करना यहां के लोगों की आस्था का ऐसा रूप है, जो देश में अपनी तरह का अकेला उदाहरण माना जाता है।
यह परंपरा आज भी न केवल संरक्षित है, बल्कि गांव की विशिष्ट पहचान बनकर पूरे उत्तराखंड की सांस्कृतिक धरोहर को समृद्ध कर रही है।






