देवभूमि उत्तराखण्ड में कई ऐसे प्राचीन स्थल हैं, जहाँ इतिहास, आस्था और रहस्य एक साथ विद्यमान हैं। इन्हीं में से एक है-लाखामंडल मंदिर (Lakhamandal Temple), जो न केवल शिवभक्तों के लिए आस्था और विश्वास का केंद्र है, बल्कि पुरातत्व और पौराणिक तथ्यों में रुचि रखने वाले लोगों के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण स्थल माना जाता है। उत्तराखण्ड के शांत और खूबसूरत पहाड़ों स्थित यह मंदिर अपने अनोखे ग्रेफाइट शिवलिंग, जो जल चढ़ाने पर चमकने लगता है और महाभारत काल से जुड़ी मान्यताओं के कारण विशिष्ट पहचान रखता है। आईये विस्तृत में जानते हैं इस मंदिर के बारे में –
देहरादून से 130 किमी की दूरी पर स्थित है जौनसार बावर का ऐतिहासिक लाखामंडल गांव। यमुना नदी के उत्तरी छोर पर अव्यवस्थित ये गांव 1370 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। यहाँ से मसूरी 75 किमी और चकराता 60 किमी की दूरी पर स्थित है। इस गांव की जनसंख्या 1500 से अधिक हैं।
क्या है मान्यता
मान्यता है कि कौरवों ने पांडवों व उनकी माता कुंती को जीवित जलाने के लिए ही यहां लाक्षागृह (लाख का घर) का निर्माण कराया था। लाखामंडल में वह एतिहासिक गुफा आज भी मौजूद है, जिससे होकर पांडव सकुशल बाहर निकल आए थे। इसके बाद पांडवों ने चक्रनगरी में एक माह बिताया, जिसे आज चकराता कहते हैं। लाखामंडल के अलावा हनोल, थैना व मैंद्रथ में खुदाई के दौरान मिले पौराणिक शिवलिंग व मूर्तियां गवाह हैं कि इस क्षेत्र में पांडवों का वास रहा है।
शिव की नगरी में मौजूद हैं सैकड़ों शिवलिंग
माना जाता है कि पांडव महाभारत के युद्ध के बाद हिमालय आए तो उन्होंने इस मंदिर का निर्माण किया और यहाँ पर एक लाख शिवलिंगों की स्थापना की। एक लाख शिवलिंगों को स्थापित किये जाने के कारण ही इस जगह का नाम लाखामंडल पड़ा है। पांडवों के अज्ञातवास काल में युधिष्ठिर ने लाखामंडल स्थित लाक्षेश्वर मंदिर के प्रांगण में जिस शिवलिंग की स्थापना की थी, वह आज भी विद्यमान है। इसी लिंग के सामने दो द्वारपालों की मूर्तियां हैं, जो पश्चिम की ओर मुंह करके खड़े हैं। इनमें से एक का हाथ कटा हुआ है।
शिव को समर्पित लाक्षेश्वर मंदिर 12-13वीं सदी में निर्मित नागर शैली का मंदिर है। यहां प्राप्त अभिलेखों में छगलेश एवं राजकुमारी ईश्वरा की प्रशस्ति (पांचवीं-छठी सदी) का उल्लेख हुआ है। इससे ज्ञात होता है कि इस स्थान के पुरावशेष वर्तमान मंदिर से पूर्वकाल के हैं और मंदिर की प्राचीनता पांचवीं-छठी सदी तक जाती है। राजकुमारी ईश्वरा की प्रशस्ति से भी यहां एक शिव मंदिर के निर्माण की पुष्टि होती है। मंदिर परिसर में स्थित दर्जनों पौराणिक लघु शिवालय, एतिहासिक और प्राचीन मूर्तियां पर्यटकों को अपनी ओर खींचती हैं। मंदिर में एक विशाल बरामदा है, जिसके मध्य में एक बड़ा शिवलिंग मंच पर विराजमान है।
ऐसे ही तमाम रहस्यों को देखते हुए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग (एएसआई) ने लाखामंडल और हनोल को ऐतिहासिक धरोहर घोषित कर यहां स्थित प्राचीन मंदिरों के संरक्षण की जिम्मेदारी ली हुई है। एएसआई को 2006 में मंदिर क्षेत्र के पास क्षतिग्रस्त दीवार की खुदाई के दौरान भगवान विष्णु की एक मूर्ति और तीन शिवलिंग मिले थे, जो विभाग के संग्रहालय में संरक्षित हैं। इस मंदिर में मौजूद मूर्तियों को देखकर इसके भव्य संग्रहालय होने का भान होता है। मंदिर के विशाल परिसर में भी ढेरों मूर्तियाँ, लघु शिवालय और शिवलिंग बिखरे हुए हैं। संरक्षण के अभाव में कई मूर्तियाँ नष्ट-भ्रष्ट हो चुकी हैं और कई खंडित होकर बिखरी हुई हैं।
केदारनाथ की ही शैली में बने इस शिवमंदिर के गर्भगृह में शिव, पार्वती के अलावा काल भैरव, कार्तिकेय, सरस्वती, गणेश, दुर्गा, विष्णु, सूर्य, हनुमान आदि भगवानों की मूर्तियाँ मौजूद हैं। इसके अलावा यहाँ पर युधिष्ठिर समेत पंचों पांडवों की भी मूर्तियाँ मौजूद हैं।
राजकुमारी ईश्वरा ने बनाया था मंदिर
लाखामंडल में मिले अवशेषों से ज्ञात होता है कि यहां बहुत सारे मंदिर रहे होंगे। लाक्षेश्वर परिसर से मिले छठी सदी के एक शिलालेख में उल्लेख है कि सिंहपुर के राजपरिवार से संबंधित राजकुमारी ईश्वरा ने अपने दिवंगत पति चंद्रगुप्त, जो जालंधर नरेश का पुत्र था, की सद्गति के लिए लाक्षेश्वर मंदिर का निर्माण कराया। लाक्षेश्वर शब्द का अपभ्रंश कालांतर में ‘लाखेश्वर हो गया। लाखेश्वर से ही ‘लाखा शब्द लिया गया। कौटिल्य के अर्थशास्त्र के अनुसार उस समय जो प्रांत अथवा जिले कर की अदायगी करते थे, उन्हें मंडल कहा जाता था। इसलिए ‘लाखा के साथ ‘मंडल शब्द जुड़कर यह लाखामंडल हो गया।
मृत्यु हो चुका व्यक्ति जीवित हो जाता था
मंदिर के पश्चिमी हिस्से में मौजूद 2 मूर्तियाँ द्वारपालों, जय, विजय, की कही जाती हैं। इस बारे में मान्यता है कि इन मूर्तियों के सामने किसी मृतक व्यक्ति को रख देने पर पुजारी उसके ऊपर गंगाजल छिड़क देते थे और वह व्यक्ति जी उठता था। जीवित होते ही वह शिव का नाम लेता था और उसके मुंह में गंगाजल डाला जाता और वह पुनः शरीर त्यागकर स्वर्ग चला जाता था। कहते हैं कि एक दफा एक स्त्री ने जिंदा हो चुके अपने पति को यहाँ से ले जाने की कोशिश की उसका बाद से यह चमत्कार नहीं हुआ है।
रहस्यमयी गुफा
लाखामंडल के भवानी पर्वत की रहस्यमयी गुफा लाखामंडल की सबसे अमूल्य धरोहर है। पुरातन शिव मंदिर। शिव और पार्वती को समर्पित यह मंदिर पांडवकालीन बताया जाता है। कहा जाता है कि इसी जगह दुर्योधन ने पांडवों को मारने के लिए लाक्षागृह अर्थात लाख का मंदिर बनाया था। इसके बाद पांडव देव कृपा से एक गुफा में होते हुए इस लाक्षागृह से बाहर निकले थे। गुफा शिव मंदिर से 2 किमी की दूरी पर ही लाखामंडल गाँव के निचले हिस्से में मौजूद है। किवदंती है कि इसी लिए युधिष्ठिर ने इस जगह पर शिव पार्वती का मंदिर बनवाया था।
शिवलिंग में दिखाई देती है अपनी छवि
लाखामंडल की एक खासियत यह भी है कि यहां प्राप्त शिवलिंग अलग-अलग रंग के हैं। ये शिवलिंग हजारों साल पुराने हैं, लेकिन देखने से और जमीन के नीचे होने से इनको कोई भी नुकसान नहीं पहुंचा। परिसर में मौजूद शिवलिंगों में से गहरे हरे शिवलिंग को द्वापर युग का बताया जाता है। जब कृष्ण ने अवतार लिया था। लाल शिवलिंग त्रेता युग का है जब राम ने अवतार लिया था। मंदिर परिसर में स्थित शिवलिंग ग्रेफाइट का बना हुआ है और जल अर्पित करने पर चमकने लगता है। इस दौरान इसमें व्यक्ति की छवि साफ नजर आती है। मान्यता है कि सृष्टि के निर्माण काल से ही यह शिवलिंग लाखामंडल में स्थापित है। ये शिवलिंग पूरे भारत में रामेश्वरम के बाद केवल लाखामंडल में मौजूद है।
देवी पार्वती के पैर के निशान
मंदिर के गर्भगृह में मौजूद पैर के निशान पार्वती के बताये जाते हैं। मंदिर के सभी पत्थरों पर मौजूद खुरों के निशान गाय माता के कहे जाते हैं। इस बारे में कहावत है की गर्भगृह के शिवलिंग की खोज तब की जा सकी जब यमुनापार की एक गाय यहाँ आकर दूध से लिंग का अभिषेक किया करती थी।
जेम्स बेली फ्रेजर ने की थी खोज
लाखामंडल के पुरावशेषों को सबसे पहले वर्ष 1814-15 में जेम्स बेली फ्रेजर प्रकाश में लाए थे। अपनी पुस्तक ‘द हिमालया माउंटेंस में उन्होंने इस स्थल पर शिव मंदिर के अलावा पांच पांडवों के मंदिर, महर्षि व्यास व परशुराम का मंदिर, प्राचीन केदार मंदिर और कुछ मूर्तियों का उल्लेख किया है। पुरातात्विक प्रमाणों के आधार पर ज्ञात होता है कि लाखामंडल प्राचीन काल में आबाद रहा है। ग्राम लावड़ी से प्राप्त महापाषाण संस्कृति के अवशेष इस अवधारणा को पुष्ट करते हैं। इस संस्कृति के अवशेष तत्कालीन मृतक संस्कारों पर विशेष रूप से प्रकाश डालते हैं। इस पद्धति में पत्थरों से निर्मित ताबूत में मृत शरीर अथवा अवशेषों को रखा जाता था।
वास्तु के साथ अद्भुत मूर्ति शिल्प
लाक्षेश्वर मंदिर आकर्षक वास्तुकला और गंवई एवं पुराने जमाने के वातावरण का मिश्रण है। मंदिर वास्तु के साथ-साथ मूर्ति शिल्प में भी लाखामंडल विशिष्ट स्थान रखता है। पत्थर पर लगभग सातवीं सदी में उत्कीर्ण जय-विजय की आदमकद प्रतिमा इस क्षेत्र के मूर्तिशिल्प का उदाहरण है। इसके अलावा शिव-पार्वती, गंगा-यमुना और अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियां भी लाखामंडल के मूर्तिशिल्प की विशिष्टता को परिलक्षित करती हैं।
संतान की कामना के लिए पहुंचते हैं दंपत्ति
लाखामंडल मंदिर के पुजारी और हकहकूधारी पंडित महिमानंद गौड़ के अनुसार वर्तमान में यहाँ के पंडित बहुगुणा, शर्मा, गौड़ (काला) लोग हैं जो मूलतः पौपौड़ी जनपद से यहाँ आये हैं। यहाँ पर प्रतिवर्ष बैशाखी के दिन भव्य मेला लगता है। मेले में बरसों से हर साल देश के कोने कोने से निसंतान दंपत्ति, संतान कामना की मनोकामना लेकर यहाँ पहुंचते हैं। यहाँ पहुचने के बाद भोले उनकी मनोकामना जरूर पूरी करते हैं। कुल मिलाकर ये कहा जा सकता है कि लाखामंडल ऐतिहासिक, पौराणिक और धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है।
—लेख – ग्राऊंड जीरो से श्री संजय चौहान।







