बागेश्वर – दिव्य शिला में अर्धनारीश्वर बने आकर्षण का केंद्र।

On: January 13, 2026 8:24 PM
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बागेश्वर में हर वर्ष उत्तरायणी मेले के अवसर पर सरयू की बीच धार में स्थित दिव्य शिला पर भगवान शिव के एक विशेष रूप को उकेरा जाता है। जो यहाँ आने वाले लोगों में आकर्षण का केंद्र रहती है। वर्ष 2026 में इस दिव्य शिला पर अर्धनारीश्वर का रूप उकेरा गया है, हर्ष आर्ट्स के कलाकार नंदन द्वारा बनाया गया अर्धनारीश्वर का यह दृश्य वाकई अद्भुत, भव्य और आध्यात्मिक ऊर्जा से परिपूर्ण है। यह सुन्दर कलाकृति उत्तरायणी मेले में आकर्षण का केन्द्र बनी हुई है।

उत्तरायणी मेला मकर संक्रांति के पावन पर्व पर जनपद बागेश्वर में सरयू-गोमती और अदृश्य गंगा सरस्वती के त्रिवेणी संगम तट पर लगता हैं, जहाँ हजारों श्रद्धालु पुण्य स्नान करते हैं, बागनाथ मंदिर में जलाभिषेक करते हैं, और यह मेला कुमाऊँ की सांस्कृतिक-धार्मिक, ऐतिहासिक, व्यापारिक दृष्टिकोण धरोहर का जीवंत प्रतीक हैं। इस पावन भूमि पर, जहाँ बाबा बागनाथ (व्याघ्रेश्वर शिव) की कृपा सर्वत्र व्याप्त हैं, सरयू की लहरों के मध्य यह विशाल शिला जैसे स्वयं भगवान की लीला का हिस्सा बन गई हो, को इस चित्र में अर्धनारीश्वर का संयुक्त स्वरूप इतनी जीवंतता से उकेरा गया हैं कि देखते ही मन श्रद्धा और विस्मय से भर जाता हैं।

अर्धनारीश्वर के इस रूप में बाईं ओर भगवान शिव का नीला, शांत, जटाधारी, त्रिपुंड्र युक्त रूप ध्यानमग्न, त्रिनेत्र, शीतलता का प्रतीक है। दाईं ओर माता पार्वती का सुंदर, रंगीन, आभूषणों से सजा, लालिमा लिए चेहरा सौंदर्य, शक्ति और मातृत्व का प्रतीक है। मध्य में वह एकता की रेखा, जो बताती है कि शिव और शक्ति अभिन्न हैं, पुरुष और प्रकृति एक हैं, सृष्टि का संतुलन इन्हीं में है।

रात्रि के अंधेरे में सरयू की बहती लहरों पर यह शिला, आसपास की जगमगाती रोशनी, घाटों की चमक और हिमालय की गोद में बसा यह दृश्य जैसे स्वर्गलोक उतर आया हो। यह चित्रण न केवल कलात्मक उत्कृष्टता हैं, बल्कि भक्ति, साधना और उत्तराखंड की लोक-संस्कृति का जीवंत प्रमाण भी हैं।

इस मेले के दौरान ऐसी कला रचनाएँ श्रद्धालुओं को और अधिक आकर्षित करती हैं, और यह शिला अब पर्यटकों व भक्तों के लिए एक सेल्फी पाइंट बन चुका है। यहाँ आने वाला हर मेलार्थी एक बार इस शिला को देखकर अवश्य मंत्रमुग्ध हो जाता है। हर्ष आर्ट के नंदन ने इसमें जो खुद को झोंक कर श्रम, प्रेम और आस्था डाली हैं, वह सराहनीय हैं यह कला सदियों तक लोगों को अद्वैत का संदेश देती रहेगी।

भगवान शिव ने अर्धनारीश्वर का रूप क्यों धारण किया?

भगवान शिव की पूजा युगों से शिवलिंग सहित उनके अनेक स्वरूपों में की जाती रही है। इन्हीं में एक अत्यंत निर्मल और गूढ़ स्वरूप है अर्धनारीश्वर, जिसमें शिव और शक्ति एक साथ विद्यमान हैं। अर्धनारीश्वर का अर्थ है-आधा पुरुष और आधी स्त्री। इस स्वरूप में आधा भाग शिव (पुरुष तत्व) का है और आधा भाग शिवा अर्थात शक्ति (स्त्री तत्व) का।

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बागेश्वर में दिव्य शिला पर अर्धनारीश्वर की कलाकृति।

पौराणिक मान्यता के अनुसार सृष्टि के आरंभ में जब ब्रह्मा जी की मानसिक सृष्टि का विस्तार नहीं हो पाया, तब उन्होंने भगवान शिव की कठोर तपस्या की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने ब्रह्मा जी को अर्धनारीश्वर रूप में दर्शन दिए और अपने शरीर के आधे भाग से शक्ति को प्रकट किया। इसी से मैथुनी सृष्टि का मार्ग प्रशस्त हुआ और सृष्टि का संचालन संभव हो सका।

अर्धनारीश्वर स्वरूप यह संदेश देता है कि स्त्री और पुरुष एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। दोनों एक-दूसरे के बिना अधूरे हैं और सृष्टि की रचना व संतुलन इन्हीं के समन्वय से संभव है। यही कारण है कि शिव और शक्ति को एक साथ प्रसन्न करने के लिए अर्धनारीश्वर स्वरूप की आराधना की जाती है। यह स्वरूप समता, संतुलन और सृजन की एकता का प्रतीक है।


चित्र एवं बागेश्वर का वर्णन – श्री भगत डसीला।

विनोद सिंह गढ़िया

विनोद सिंह गढ़िया इस पोर्टल के फाउंडर और कंटेंट क्रिएटर है। करीब 15 वर्षों से वे विभिन्न डिजिटल मंचों के माध्यम से उत्तराखण्ड की संस्कृति, परंपरा, पर्यटन आदि से जुड़े लेख और सम-सामयिक घटनाओं पर आधारित समाचार आप सभी तक पहुंचाते हैं।

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