भिटौली: पहाड़ के लोक में स्थापित विशिष्ट परंपरा

On: March 29, 2026 10:09 AM
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​देवभूमि उत्तराखंड के रीति-रिवाज और परंपराएं विशिष्ट हैं। हिमालय के सांस्कृतिक रंग यहां के लोकजीवन में सदियों से घुले हैं। यहां की संस्कृति रिश्तों को जीने की कला सिखाती है। यह चैत का महीना है और चैत अपने साथ भिटौली ( Bhitauli) का उपहार लेकर आता है। भिटौली मतलब उत्तराखंड के लोक में रची-बसी ऐसी अनूठी परंपरा जो सदियों से देवभूमि में मातृसत्तात्मक संस्कृति यानी शक्ति (मां) प्रधान परंपरा की याद दिलाती है तो लोकजीवन में बहन व बेटी के प्रति स्नेह, सम्मान व भावनात्मक सहारा देने की प्रेरणा भी देती है। भिटौली संस्कृति बताती है कि विवाह के उपरांत कैसे एक बेटी दो घरों की समृद्धि और संपन्नता की द्योतक है, जो दर्शाती है कि उत्तराखंडी संस्कृति में विवाह के बावजूद मायके की फसल पर बेटी का भी अधिकार है। चैत ऐसा महीना है जब बेटी-बहन की भावनाओं में अपने मायके की नराई (याद) मिल जाती है।

Bhitauli Festival Uttarakhand

अनुपम परंपरा, अद्भुत रिवाज है भिटौली : धार्मिक व रंगीले चैत्र की भिटौली परंपरा माता-पिता के बेटी व भाई के बहन के प्रति महज स्नेह से ही नहीं जुड़ी है, बल्कि बेटी या बहन के विवाह के बाद भी उसके मायके से जुड़ाव व प्रकृति पुरुष के सुंदर तालमेल से सींचे गए खेतों में उगने वाली फसल पर बेटी या बहन के अधिकार को भी दर्शाती है। इसीलिए बेटी या बहन को मायके के साथ ससुराल का सम्मान ऊंचा रखने की सीख दी जाती है और वह दो घरों या परिवारों के सम्मान की चिंता भी करती है। चैत्र में माता-पिता, भाई भाभी का मायके से नई फसल से बने पकवान, व्यंजन, गुड़ आदि उपहार लेकर बेटी या बहन की ससुराल पहुंच भेंटने, कुशलक्षेम पूछ उपहार भेंट करने का अद्भुत रिवाज है भिटौली।

​सदियों से निभाई जा रही परंपरा

युवा इतिहासकार भगवान सिंह धामी अपने अध्ययन का हवाला दे बताते हैं कि भिटौली परंपरा कब शुरू हुई, इसका लिखित इतिहास तो नहीं मिलता, मगर यह रिवाज सदियों से चला आ रहा है। भिटौली की परंपरा मानवीय संवेदनाओं, सामाजिक जुड़ाव, भाई बहन व बेटी के रूप में प्राचीन भावनात्मक प्रथा है। जब सड़क सुविधाएं नहीं थी, मीलों दूर दुरूह सफर तय कर दुर्गम पहाड़ियों को पार कर बेटी का मायके जाना संभव नहीं होता था, तब माता-पिता या भाई ने चुनौतियों के पहाड़ में भिटौली की परंपरा को उसी उत्साह से जिया होगा। मायके से नई फसल से तैयार पकवान व उपहार लेकर बहन या बेटी की ससुराल में पहुंच भेंट करना रिश्तों से जुड़ाव को दर्शाता है।

​बेटी-बहन के लिए मायके की मीठी यादें और भिटौली के गीतों का सृजन

​वरिष्ठ संस्कृतिकर्मी एवं रचनाकार नवीन सिंह बिष्ट कहते हैं कि उत्तराखंड की पुरातन लोक परंपरा भिटौली पर अब तक 60 से ज्यादा लोकगीत रचे जा चुके हैं। विषम भूगोल वाले पहाड़ में पुराने दौर में बेटियों की वेदना, मायके की मीठी यादें, भाई के पहुंचने के इंतजार में राह ताकती आंखों की पीड़ा और मां, पिता या भाई का बेटी या बहन की ससुराल पहुंच भेंटने की आतुरता ने ही कालांतर में गीतों का रूप लिया। मसलन, ‘किलै बिवायू इतू दूर, इजुली मेरी झुरींगे पराणी, देखिनै देखिनै या बेटी नि दिखिनै डांडा…‘, ‘भैया ल्याली भिटौली, मैते के नराई फिडैली…‘ आदि गीत भाई बहन के रिश्तों की गहराई और आत्मीय मिलन की वेदना को दर्शाते हैं।

​​नई पीढ़ी को बड़ा संदेश

आधुनिकता के साथ अब भिटौली की परंपरा में कुछ बदलाव भी आ गए हैं। संस्कृति कर्मी लेखक संजय चौहान के अनुसार डिजिटल दौर में यह परंपरा युवा पीढ़ी को सीख देती है कि कठिन हालात में भी भाई-बहन के रिश्ते को कैसे निभाया जाता है। तमाम सुविधाओं के बावजूद ग्रामीण क्षेत्रों में यह परंपरा बखूबी निभाई जाती रही है। आज भी पर्वतीय क्षेत्रों में सिर पर उपहार से भरी डलिया (टोकनी) को लेकर मां या फिर भाभियां अपनी बेटी या ननद की ससुराल के लिए लंबा सफर तय कर पहुंचती हैं, जो रिश्तों को निभाने की अनूठी मिसाल है। -साभार : रानीखेत से दीप सिंह बोरा (दैनिक जागरण)

भिटौली-उत्तराखंड की महिलाओं को समर्पित एक विशिष्ट परम्परा है। उत्तराखंड के कुमाऊँ में यह परम्परा कैसे शुरू हुई, इस पर यहाँ एक दंत कथा प्रचलित है, वहीं इसका संबंध चैतोला पर्व से भी जोड़कर देखते हैं। यह लेख विस्तृत में इस पढ़ें – भिटौली देने की परम्परा

विनोद सिंह गढ़िया

विनोद सिंह गढ़िया इस पोर्टल के फाउंडर और कंटेंट क्रिएटर है। करीब 15 वर्षों से वे विभिन्न डिजिटल मंचों के माध्यम से उत्तराखण्ड की संस्कृति, परंपरा, पर्यटन आदि से जुड़े लेख और सम-सामयिक घटनाओं पर आधारित समाचार आप सभी तक पहुंचाते हैं।

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