हिमालयी महाकुम्भ यानी उत्तराखण्ड की आस्था, संस्कृति और परंपरा की सबसे बड़ी प्रतीक ‘नंदा देवी राजजात यात्रा’ को लेकर बड़ा फैसला सामने आया है। सितंबर 2026 में प्रस्तावित इस ऐतिहासिक यात्रा को अब वर्ष 2027 में आयोजित किया जाएगा। नंदा राजजात समिति ने इस संबंध में औपचारिक निर्णय लेते हुए स्पष्ट किया है कि इस वर्ष ज्येष्ठ माह में अधिमास (मलमास) के चलते राजजात आयोजन की तिथियां काफी आगे चली गई हैं, जिस कारण यात्रा को स्थगित करने का निर्णय लिया गया है।
सुरक्षा कारणों से टली यात्रा
समिति के अनुसार इस वर्ष नंदा नवमी तिथि अधिमास आ जाने के कारण 20 सितम्बर को पड़ रही है। इस दौरान उच्च हिमालयी क्षेत्रों में हिमस्खलन, भूस्खलन और प्राकृतिक आपदाओं का खतरा अधिक रहता है। पूर्व में इसी अवधि में कई गंभीर घटनाएं सामने आ चुकी हैं, जिनसे श्रद्धालुओं की सुरक्षा पर संकट खड़ा हुआ। इन्हीं जोखिमों को ध्यान में रखते हुए यात्रा की तिथि आगे बढ़ाने का निर्णय लिया गया है, ताकि श्रद्धालुओं को सुरक्षित और व्यवस्थित अनुभव मिल सके।
वसंत पंचमी पर होगी औपचारिक शुरुआत
समिति ने बताया कि यात्रा की औपचारिक शुरुआत से जुड़ी मनोती आने वाली बसंत पंचमी पर की जाएगी। उसके पश्चात पंचांग गणना, धार्मिक परंपराओं और प्रशासनिक तैयारियों के आधार पर यात्रा की सटीक तिथियों की घोषणा की जाएगी। समिति का कहना है कि निर्णय का उद्देश्य धार्मिक मर्यादाओं के साथ-साथ लाखों श्रद्धालुओं की सुरक्षा सुनिश्चित करना है।
सरकार से प्राधिकरण और बजट की मांग
नंदा राजजात समिति ने राज्य सरकार से हरिद्वार में होने वाले कुंभ मेले की तर्ज पर अलग प्राधिकरण के गठन की मांग की है। साथ ही यात्रा के भव्य और सुरक्षित आयोजन के लिए करीब 5,000 करोड़ रुपये के बजट की आवश्यकता बताई गई है। समिति का मानना है कि विशाल यात्रा और अंतरराष्ट्रीय स्तर की सहभागिता को देखते हुए स्थायी प्रशासनिक ढांचे की आवश्यकता है।
क्या है नंदा देवी राजजात यात्रा
नंदा राजजात उत्तराखण्ड की केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि गढ़वाल और कुमाऊं की लोकआस्था, संस्कृति और परम्परा की आत्मा मानी जाती है। इसे एशिया की सबसे लंबी, कठिन और चुनौतीपूर्ण पैदल धार्मिक यात्राओं में शामिल किया जाता है।
उत्तराखण्ड की लोक मान्यताओं के अनुसार यह यात्रा हिमालय पुत्री मां नंदा देवी को उनके मायके गढ़वाल से उनके ससुराल होमकुंड तक विदा करने का प्रतीक है। मां नंदा देवी को भगवान शिव की अर्धांगिनी और हिमालय की अधिष्ठात्री देवी माना जाता है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
इतिहासकारों के अनुसार नंदा राजजात का उल्लेख 8वीं–9वीं शताब्दी से मिलता है। कत्यूरी और गढ़वाल शासकों ने इस यात्रा को राजकीय संरक्षण प्रदान किया था। प्राचीन काल में ये शासक स्वयं इस यात्रा को आयोजित करते थे, इसी कारण इसे “राजजात” कहा गया। यह यात्रा गढ़वाल और कुमाऊं अंचल की साझा सांस्कृतिक आस्था का प्रतीक भी है, जिसने सदियों से यहाँ के लोगों को एकजुट रखा है।
चौसिंगिया खाडू : यात्रा की पहचान
नंदा राजजात आयोजन की परंपरा चार सींग वाले दुर्लभ भेड़ यानी चौसिंगिया खाडू से जुड़ी है। मान्यता है कि चार सींग वाले भेड़ के जन्म के साथ ही राजजात के आयोजन का समय निश्चित हो जाता है। यह चौसिंगिया खाडू राजजात का अग्रदूत होता है और मां नंदा देवी का प्रतीकात्मक प्रतिनिधि माना जाता है।
यात्रा मार्ग और अवधि
नंदा राजजात यात्रा चमोली जिले के नौटी गांव से प्रारम्भ होती है, जो इड़ा बधाणी, कासुंवा, कोटी, नंदकेसरी, थराली, वांण, बेदनी बुग्याल, रूपकुंड, शिलासमुद्र होते हुए होमकुंड पर चौसिंगिया खाडू के विदाई कर समाप्त होती है।
दुर्गम हिमालयी क्षेत्र, बर्फीले पहाड़, ऊंचे बुग्याल और कठिन मौसम के बीच करीब 280 किलोमीटर की पैदल यात्रा 20 से 25 दिन में पूर्ण होती है।
धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व
धार्मिक रूप से यह यात्रा उत्तराखण्ड की ध्याणी मां नंदा देवी की कैलाश को विदाई और शिव-शक्ति परंपरा से जुड़ी हिमालयी लोकदेवताओं की सामूहिक पूजा का प्रतीक है।
सांस्कृतिक दृष्टि से देखें तो यह यात्रा लोकगीतों, जागर, झोड़ा-छपेली, पारंपरिक वेशभूषा, सामूहिक भंडारों और सेवा परंपराओं का जीवंत स्वरूप है। इसी कारण इसे उत्तराखण्ड की चलती-फिरती लोकसंस्कृति का संग्रहालय भी कहा जाता है।
सहभागिता और अनुमान
- एक आंकड़े के अनुसार वर्ष 2014 की नंदा राजजात में विभिन्न चरणों में करीब 20 लाख श्रद्धालु शामिल हुए थे।
- वर्ष 2027 में 30 से 50 लाख श्रद्धालुओं के शामिल होने का अनुमान जताया जा रहा है।
- देश-विदेश से तीर्थयात्री, शोधकर्ता और पर्यटक भी बड़ी संख्या में पहुंचते हैं, इसलिए इसे हिमालय का महाकुंभ कहा जाता है।
प्रशासनिक तैयारियां
यात्रा के दौरान राज्य सरकार और जिला प्रशासन की ओर से सुरक्षा बलों की तैनाती, स्वास्थ्य शिविर और मोबाइल अस्पताल, सैटेलाइट फोन व संचार व्यवस्था, डिजास्टर मैनेजमेंट प्लान, ट्रैक सुधार और अस्थायी पुल निर्माण पर्यावरण संरक्षण व प्लास्टिक प्रतिबंध जैसे व्यापक इंतजाम किए जाते हैं, ताकि इस ऐतिहासिक यात्रा को सुरक्षित, सुव्यवस्थित और पर्यावरण के अनुकूल तरीके से संपन्न हो सके।










